आज १२-१३ अगस्त २०१२ को , परम पूज्य दादा जी इतिहास केसरी मास्टर नत्थासिंह जी "निर्दोष" की  ४०वी पुण्यतिथि पर , अपने बड़े बुजुर्गों के शुभाशीष और आशीर्वाद से , बड़े हर्ष के साथ यह वेबसाइट आप  को समर्पित करते हैं . इसके मात्ध्यम से और आप सब के अटूट सहयोग से   आजीवन आप सब की सेवा और शुभ कार्य करने का अवसर प्राप्त होगा, ऐसी हमारी आशा है.  जय भोले बाबा की !!

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जिनके गीत भक्ति  शक्ति के प्रतीक हैं ...

 स्व. इतिहास केसरी मास्टर नत्थासिंह जी ‘‘निर्दोश’’

सोभाग्यषाली हैं वे इन्सान जो इस प्रकार में आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अनेक प्रेरणादायक ज्ञानदायक व आध्यात्मिकता की ओर ले जाने वाले जरूरी कार्य करके इस संसार से विदा होते हैं। ‘‘यह संसार नाषवान है’’ ऐसा ग्रन्थों ने फरमाया है और दुनिया न आजमाया है। “शरीर करके इस दुनिया में आज तक कोर्इ नहीं रहा चाहे ऋशि, मुनि व अवतार भी क्यों न हो लेकिन जहां आत्मा कहते हैं कि अमर है वहां ऐसी भी सषक्त धारणा है कि देष, समाज व जनता के लिए जीवन कुर्बान करने वाले भी सदैव अमर हैं। जिन आत्मओं की पूज्य यादे कायम रहती हैं वे मर कर भी जिन्दा हैं, परन्तु वे जीवित भी मृतक के समान हैं, जो केवल अपने लिए ही जीते रहते हैं तथा संसार को भी कश्ट पहुंचाने का प्रयास करते रहते हैं।

हमारे देष को इस बात का विषेश गौरव है कि स्वर्गीय इतिहास-केसरी मास्टर नत्था सिंह जी ने जहां अपना सारा जीवन देषभक्ति व प्रभुभक्ति के प्रचार में लगाया, वहां उनके आकस्मिक निधन के बाद आज भी उनके “शेयर, गीत व इतिहास लाखों लोगों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत है। 40-50 वर्श पूर्व की रचनाओं में भी अपूर्व नवीनता है, चेतना है, स्फूर्ति व ताजगी हे। उनके गीत कर्इ धर्म-प्रचारकों की आजीविका का आधार है।

मास्टर नत्था सिंह जी का जन्म सन् 1905 में दुर्गाश्टमी के पवित्र दिन पर गिदडपिण्डी गांव, जड़ा वाला (पाकिस्तान) में हुआ। पूर्व जन्म के “शुभ संस्कारों के कारण मास्टर जी की रूचि प्रारम्भ में ही प्रभु-भक्ति व संगीत की ओर थी। मास्टर जी ने स्कूल में तो षिक्षा कम प्राप्त की, लेकिन व आध्यात्मिक ज्ञान के इतने समुद्र थे कि उनकी रचनाओं को सुन कर बड़े-बड़े विद्वान भी चकित हो जाते थे। मास्टर जी ने मिडल तक षिक्षा-प्राप्त करने के बाद मास्टर कर्म सिंह जी से संगीत विद्या का अध्ययन किया और 12 वर्श की अल्पायु में ही उन्होंने उच्च ज्ञान देने वाले गीत लिखने व बोलने “शुरू कर दिये। सन् 1926 में परम पूज्य युगपुरूश श्री 1008 मुनि हरमिलापी जी महाराज तथा गोस्वामी गणेषदत्त जी के सम्पर्क में आने पर धार्मिक मंचों पर मास्टर जी का “शुभ नाम चमकने लगा। मास्टर जी की रोचक व काव्यमयी “ौली से श्रोतागण आनन्द विभोर हो जाते थे। लोगों की यह इच्छा रहती थी कि मास्टर जी बोलते ही जाएं, क्योंकि कुनीन की तरह कड़वे “शब्द भी वे जनता के दिलों में इतनी मिठास व पवित्रता से पहुंचाते थे कि नास्तिकों के दिलों मे भी धर्म के प्रति श्रद्धा की घंटिया बजनी “शुरू हो जाती थीं।

सन् 1947 में देष के विभाजन के बाद मास्टर जी लुधियाना “ाहर में आकर आबाद हुए। मास्टर जी इतने सर्वप्रिय थे कि हम मतमतान्तर के श्रद्धालु उन्हें अपने समारोहों उन्हें अपने समारोहों में विषेष तौर पर आमन्त्रित करते थे। कोर्इ भी ऐसा धार्मिक सम्मेलन सफल नहीं समझा जाता था जिसमें मास्टरजी “शामिल न हों। मास्टर जी का भारत साधु-समाज में विषेष मान व सम्मान था, क्योंकि व राग-द्वेश से पूर्णतया रहित थे, अति मायूस भी उनके चरणों में बैठकर मुस्कुराने पर मजबूर हो जाता था। मास्टर जी ने देष के हर “ाहर व गांव में जाकर धर्म प्रचार किया। इस बात की विषेष प्रसन्नता है कि मास्टर जी के निधन के बाद भी आज श्री हरमिलाप मिषन के परमाध्यक्ष युगपुरूश श्री 1008 श्री मुनि हरमिलापी जी महाराज अपने समारोहों में मास्टर जी के गीत विषेष प्यार से सुनते हैं क्योंकि मास्टर जी के हृदय में भी पूज्य श्री हरमिलापी जी महाराज के इतना असीम आदर व प्यार था कि मास्टर जी ने अंतिम गीत इक रूहानी जोत सी, जगमा के तुर गर्इ पूज्य श्री महाराज जी की धर्मबहिन ब्रह्मलीन श्री जीवन मुक्त जी महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए श्री प्रेम मन्दिर (अम्बाला “ाहर) में इतनी गम्भीर मुद्रा में गाया कि लाखों लोग फूट-फूट कर रोने लग गये, लेकिन क्या पता था कि मास्टर जी स्वयं भी “ाीघ्र इस संसार को छोड़ जाएंगे और उनकी पवित्र यादें कभी भूल न सकेंगी-मास्टर जी भी इस श्रद्धांजली कार्यक्रम में “ाीघ्र बाद 3 सितम्बर 1972 को अंतिम यात्रा पर रवाना हो गए। उनकी मृत्यु के दुख से कोर्इ पत्थर दिल होगा जो न तड़पा हो।

परन्तु प्रभु की इस लीला को मास्टर जी ने पूरी तरह खुद भी समझ रखा था और उन्होंने लिखा भी-

किसी दिन देख लेना ऐसी नींद आएगी।

तूूं सोया फिर जागेगा तुझे दुनियां जगाएगी।

मास्टर जी का जीवन निश्कपट व पवित्र था, वे गृहस्थ में रहते हुए भी एक महान सन्त आत्मा थे। उनके ही “ाब्दों मे -

भस्मी रमाने से ने रेषमी दुषालों से

बन्दा पहचाना जाता है सिर्फ ऐमालों से।

जो धर्म-परायण हो उसकी ही प्रभु-चरणों मे अटूट विष्वास होता है। मास्टर जी के गीत भी जहां र्इष्वर की सर्व-व्यापता को सिद्ध करते थे वहां उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया कि-

कमजोरियां जब मन के पांव उखाड़ती हैं,

प्रभु देते हैं सहारा जिस वक्त डोलता हूं।

संसार में जाने अनजाने हर इन्सान से गलती होती है, केवल भगवान ही ऐसे हैं जो पूर्ण हैं। मास्टर जी ने समझाया-

सब में कोर्इ कोर्इ दोश रहा, एक विधाता निर्दोश रहा

मास्टर जी जानते थे कि हमारी गल्तियों को परमात्मा अवष्य क्षमा करेगा, अगर हम प्रयास करें। उनका यह विष्वास इस रचना से सिद्ध होता है-

‘मेरी भूलों को अगर तूं भी भुला दे दिल से।

फिर अगर तुझको भुलाऊँ तो सजावार हूँ मैं।।

परन्तु प्रभु हमारे अपराधों को तभी क्षमा करेंगे अगर हम झूठे अभिमान का त्याग करेंगे - खुदा को पाने के लिए खुदी को मिटाना जरूरी है। जिसे मास्टर जी ने समझाया-

‘‘तू अगर खुद को खो नहीं सकता,

उसका दीदार हो नहीं सकता।’’

और र्इष्वर तो सर्वव्यापक है, अन्तर्यामी है, सृश्टि के हर कण-कण में विद्यमान है ‘‘जर्रे-जर्रे में है झांकी भगवान की’’ पर जो व्यक्ति इस बात को नहीं मानता वह हैवान व “ौतान है। लेकिन जो र्इष्वर की सर्वव्यापता को मानता है उस पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मास्टर जी ने लिखा-

जिसको हर चीज़ में भगवान नज़र आता है,

मुझे वो आदमी इन्सान नज़र आता है।

मास्टर जी ने ग्रन्थों के गूढ़ विशयों को भी इतनी सरलता से लेखनीबद्ध किया है कि आम व्यक्ति भी इन्हें आसानी पूर्वक समझ सकता हैं गीता के दार्षनिक सिद्धान्त ‘‘सुख दु:ख सम’’ को समझाते हुए उन्होंने लिखा-

सुख में हंसना दु:ख में रोना यह काम अनजान का है।

हर हालत में खुष रहना यह जीवन ज्ञानवान का है।।

मैं समझता हूं कि मास्टर जी का अनुभव इतना महान था कि उन्होंने देष के मौजूदा हालात के बारे में कर्इ वर्श पहले ही सम्भवत: भविश्यवाणी कर दी थी। उनके “ाब्दों में -

‘‘उन्नति और अमन की आरजू खतरे में है,

आज भारत की इज्जत आबरू खतरे में है।’’

मास्टर जी कितने अन्तर्यामी थे- आप अन्दाजा लगाइये कि आज जो संकीर्णता व साम्प्रदायिकता से मतभेद उत्पन्न हो रहे हें उन पर भी उन्होंने कर्इ वर्श पहले अपनी कलम चला दी थी और लिखा था-

‘‘हिन्दु सिख दा प्यार विगड़ता जांदा

उल्फत दा संसार विगड़दा जांदा ए।’’

इस स्वाथ्र्ाी संसार के बारे में भी उन्होंने सावधान करते हुए लिखा-

‘‘यह सोना या चांंदी की सुनता है जो झंकारे,

यह चीखे हैं बेकस की मजदूर की पुकारें।

समझा है लाल जिनको दर-असल हैं अंगार,

मन तू जा इस मोह माया के बाजार।।

मास्टर जी महान गायक, उच्च लेखक, भजनोपदेषक, इतिहासकार व देष-भक्त थे।

ााहबाद में मास्टर जी की यादें चमकाने वाले श्री सुरेष चन्द्र जी-

ब्रह्मलीन मास्टर जी के देहान्त के बाद उनकी पवित्र यादों को चमकाने का सर्वाधिक श्रेय “ााहबाद मारकंडा के संगीतकार श्री सुरेष जी को है। जिन्होंने प्राचीन श्री षिव मन्दिर में पूज्य मास्टर जी की आकर्शक प्रतिमा स्थापित करवार्इ और हर वर्श वहां षिवरात्रि के पर्व पर मास्टर जी की याद में श्रद्धांजलि समारोह होता है। श्री सुरेष जी अति अनुभवी व सुलझे हुए धर्म-प्रचारक थे। वे इस समारोह में सभी भजनीकों को प्यार से बुलाते थे। “ाारीरिक तौर पर अस्वस्थ रहते हुए भी मास्टर जी के सद्गुणों, उपदेषों व सिद्धांतों का प्रचार करते रहते थे। मास्टर जी के कल्याणकारी गीतों पर आधारित इस पुस्तक के लिए उन्होंने बहुत योगदान दिया है।

श्री सुरेष जी व मास्टर जी के लिए विषेष प्यार रखने वाले पण्डित जगदीषचन्द जी (बनूड़ वाले भी) ने भी इस पुस्तक के लिए प्रषंसनीय कार्य किया है। श्री जगदीष जी तो मास्टर जी के ऐसे षिश्य थे जो उनके निधन पर बेहद तड़पे थे। मुझे याद है कि मास्टर जी के श्रद्धांजलि-समारोह पर भी वे एक तरफ सुन्न होकर खड़े रहे। मास्टर जी के आषीर्वाद से पण्डित जगदीष जी का भी धार्मिक जगत में विषेश मान है और श्री जगदीष जी मास्टर जी के परिवार से निरन्तर सम्बन्ध बनाए हुए थे।

स्व. मास्टर जी के सुपुत्र श्री केवल कृश्ण, श्री बलदेव कृश्ण, मास्टर जी की धर्मपत्नी श्रीमती सावित्री देवी, मास्टर जी के भ्राता श्री मोहन जी, मास्टर जी की सुपुत्री श्रीमती सुभाशनी बेदी और मास्टर जी के दामाद श्रीमान् आर. आर. बेदी सलो (यू.के.) ने मास्टर जी के बेहद कीमती गीतों को प्रकाषित करके धार्मिक जनता पर महान उपकार किया है। उनके इस प्रयास से लाखों लोगों का मार्गदर्षन इन गीतों को पढ़ने से ही हो जाएगा और अगर इन पर अमल किया जाए तो भविश्य उज्ज्वल हो जाएगा।

कृश्ण राजपाल

प्रचार मंत्री, श्री हरमिलाप मिषन

Last Updated on Wednesday, 08 August 2012 23:12